संवाददाता यूसुफ खान
मुरादनगर। मुरादनगर की सड़कों पर फैला अतिक्रमण अब केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली पर बड़ा सवाल बन चुका है। बस स्टैंड से लेकर ओलंपिक तिराहे, रेलवे रोड और मुख्य बाजार तक हालात ऐसे हैं कि आम नागरिकों का पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है। सड़कें सिकुड़ चुकी हैं, जाम आम बात बन गया है और दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद नगर पालिका परिषद का अतिक्रमण हटाओ अभियान लोगों की नजर में केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है नगर पालिका का बुलडोजर आता है, कुछ दुकानों और ठेलों को हटाया जाता है, फोटो खिंचती हैं, प्रेस विज्ञप्ति जारी होती है और अधिकारियों की पीठ थपथपाई जाती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि कार्रवाई खत्म होने के कुछ ही मिनटों बाद वही अतिक्रमणकारी दोबारा सड़क पर कब्जा जमा लेते हैं। यदि अतिक्रमण फिर वहीं लौट आता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह अभियान किसके लिए चलाया जा रहा है—जनता की सुविधा के लिए या केवल कागजी उपलब्धियां दिखाने के लिए स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन वास्तव में गंभीर होता तो बार-बार अतिक्रमण करने वालों पर जुर्माना, लाइसेंस निरस्तीकरण और कानूनी कार्रवाई होती। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। इससे यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं कुछ लोगों को राजनीतिक संरक्षण तो नहीं प्राप्त है, जिसके कारण कार्रवाई का असर दिखाई नहीं देता सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ रहा है, जबकि जिम्मेदार विभाग और अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं। अब समय आ गया है कि शासन इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कराए और यह तय करे कि अतिक्रमण हटाओ अभियान वास्तव में समाधान है या केवल दिखावे का एक और अध्याय जनता जवाब चाहती है और मुरादनगर की सड़कें भी।
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