स्वच्छता का ढोंग या व्यवस्था की बदहाली मुरादनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के शौचालय देख रोंगटे खड़े हो जाएंगे

उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के मुरादनगर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की तस्वीरें किसी सरकारी दावे की पोल खोलने के लिए काफी हैं। कागजों में स्वच्छता, हकीकत में संवेदनहीनता—यहां के शौचालयों की हालत देखकर कोई भी दंग रह जाएगा बाहर से देखने पर शौचालय इतने साफ-सुथरे नजर आते हैं कि मानो किसी होटल या गेस्ट हाउस का हिस्सा हों। व्यंग्य यह है कि पहली नजर में ऐसा लगे कि आप अपने मेहमानों को बुलाकर यहां नाश्ता या भोजन तक करा सकते हैं लेकिन जैसे ही आप थोड़ा अंदर झांकते हैं, “स्वच्छ भारत” के नारों की असलियत सामने आ जाती है। इन चमचमाते शौचालयों में सबसे जरूरी चीज—पानी—का पूरी तरह अभाव है। न फ्लश के लिए पानी, न हाथ धोने के लिए, न साफ-सफाई बनाए रखने के लिए। अगर कोई मरीज या उसके परिजन मजबूरी में इन शौचालयों का उपयोग करना चाहें, तो उन्हें पानी घर से या बाहर से लाना पड़ेगा सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह स्थिति किसी दूरदराज गांव की नहीं, बल्कि मुरादनगर जैसे कस्बे के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की है, जहां रोजाना सैकड़ों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे और गंभीर मरीज—सब इसी व्यवस्था के भरोसे हैं। ऐसे में शौचालय में पानी न होना न सिर्फ लापरवाही है, बल्कि सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी है स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित क्यों रह जाती है? क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों में होते हैं? यह सवाल अब जनता पूछ रही है। मुरादनगर सीएचसी के ये शौचालय सरकार के स्वच्छता अभियानों पर बड़ा प्रश्नचिह्न हैं। जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी मौके पर आकर हालात देखें और तुरंत पानी की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करें, ताकि स्वास्थ्य केंद्र सच में “स्वास्थ्य” का केंद्र बन सके, न कि व्यवस्था की विफलता का नमूना





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