लुप्त होते जोहड़, डूबता मुरादनगर: खसरा संख्या 712 और 941 की अनदेखी से बरसात में बेहाल हो जाती है जनता


संवाददाता यूसुफ खान
मुरादनगर। एक ओर केंद्र और प्रदेश सरकार जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जलाशयों के पुनर्जीवन पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर मुरादनगर के सरना क्षेत्र में राजस्व अभिलेखों में दर्ज खसरा संख्या 712 एवं 941 के जोहड़ प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। वर्षों से इन जोहड़ों की न तो समुचित सफाई कराई गई और न ही इनके संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया, जिसका खामियाजा हर वर्ष बरसात के मौसम में कस्बे की जनता को भुगतना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि खसरा संख्या 712 और 941 में दर्ज जोहड़ प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि इनकी नियमित सफाई और गहरीकरण कराया जाए तो बरसात के दौरान बड़ी मात्रा में वर्षा जल का संचयन संभव है। लेकिन प्रशासन की उदासीनता के चलते ये जोहड़ गाद, झाड़ियों और कूड़े-कचरे से पट चुके हैं। परिणामस्वरूप बारिश का पानी सड़कों और गलियों में भर जाता है और पूरा कस्बा जलभराव की गंभीर समस्या से जूझने लगता है। बरसात के दिनों में मुरादनगर की कई प्रमुख सड़कें तालाब का रूप धारण कर लेती हैं। लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो जाता है। स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार दोपहिया वाहन फिसलकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं, जबकि व्यापारियों को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। हैरत की बात यह है कि हर साल जलभराव की समस्या सामने आने के बावजूद जिम्मेदार विभाग स्थायी समाधान की दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि यदि समय रहते इन दोनों जोहड़ों की सफाई, गहरीकरण और तारबंदी कर दी जाए तो न केवल जलभराव की समस्या में काफी हद तक राहत मिल सकती है, बल्कि भविष्य में इन पर अवैध कब्जों की आशंका भी समाप्त हो जाएगी। वर्तमान में जोहड़ों की स्थिति ऐसी है कि आम व्यक्ति के लिए यह पहचानना भी मुश्किल हो गया है कि यहां कभी सार्वजनिक जलाशय हुआ करते थे। पर्यावरण विशेषज्ञों का भी मानना है कि जलाशयों का संरक्षण केवल जलभराव रोकने का साधन नहीं बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने और पर्यावरण संतुलन के लिए भी आवश्यक है। इसके बावजूद यदि राजस्व अभिलेखों में दर्ज जोहड़ों की यह दुर्दशा बनी रहती है तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। नगरवासियों ने जिलाधिकारी, उप जिलाधिकारी, नगर पालिका परिषद एवं सिंचाई विभाग से मांग की है कि खसरा संख्या 712 और 941 में दर्ज जोहड़ों का तत्काल सर्वे कराया जाए, उनकी सीमाएं चिन्हित की जाएं, व्यापक सफाई अभियान चलाकर गहरीकरण कराया जाए तथा चारों ओर मजबूत तारबंदी कराकर इन्हें सुरक्षित किया जाए। लोगों का कहना है कि यदि इस बार भी बरसात से पहले कार्रवाई नहीं हुई तो जलभराव की समस्या पहले से अधिक विकराल रूप धारण कर सकती है। अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर राजस्व अभिलेखों में दर्ज सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है? और यदि जिम्मेदार विभाग समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाते तो क्या आज मुरादनगर की जनता को हर वर्ष जलभराव की इस समस्या से जूझना पड़ता? नगरवासियों की निगाहें अब शासन और प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इन लुप्तप्राय जोहड़ों को पुनर्जीवित कर जनता को राहत दिलाने के लिए कब तक ठोस कदम उठाता है।

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