खुले नाले, बंद जिम्मेदारी: मौतों का सिलसिला, आखिर कब जागेगी नगर पालिका परिषद

संवाददाता यूसुफ खान 
मुरादनगर में खुले और खतरनाक नालों का मुद्दा अब केवल गंदगी, बदबू और जलभराव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे-सीधे लोगों की जान लेने वाला गंभीर खतरा बन चुका है। ताजा मामला बुधवार 24 जून 2026 का है, जब सुबह लगभग 09:20 बजे पीआरबी को सूचना मिली कि अंबेडकर पार्क के सामने स्थित नाले में एक अज्ञात पुरुष का शव पड़ा हुआ है। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को नाले से बाहर निकलवाकर उसकी पहचान कराई गई। मृतक की पहचान इमरान पुत्र असगर, निवासी मलिक नगर, उम्र करीब 30 वर्ष के रूप में हुई। पुलिस द्वारा पंचनामा भरकर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर मुरादनगर की उस भयावह सच्चाई को उजागर कर दिया है, जिसे नगर पालिका परिषद लंबे समय से नजरअंदाज करती आ रही है। सवाल केवल एक शव मिलने का नहीं है, सवाल उस लापरवाही का है जिसने पूरे शहर को मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। मुरादनगर के कई नाले आज भी खुले पड़े हैं, उनकी गहराई इतनी अधिक है कि यदि किसी व्यक्ति का पैर फिसल जाए तो उसका बच पाना लगभग असंभव हो सकता है। बरसात के मौसम में स्थिति और अधिक भयावह हो जाती है, जब पानी, कीचड़ और अंधेरे के बीच नाले मौत के जाल में बदल जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पहली घटना नहीं है। नगर पालिका परिषद मुरादनगर के नालों से पहले भी शव मिलने, लोगों के गिरने और हादसों की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसके बावजूद न तो नालों को ढकने की ठोस व्यवस्था की गई, न सुरक्षा रेलिंग लगाई गई, न चेतावनी बोर्ड लगाए गए और न ही संवेदनशील स्थानों पर प्रकाश व्यवस्था दुरुस्त की गई। सवाल यह है कि आखिर नगर पालिका परिषद किस बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रही है? क्या हर बार एक नई मौत के बाद सिर्फ औपचारिकताएं पूरी कर दी जाएंगी शहरवासियों में इस घटना को लेकर भारी रोष है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते नालों को ढकने, किनारों को सुरक्षित करने और नियमित निगरानी की व्यवस्था की गई होती, तो शायद आज एक और परिवार उजड़ने से बच सकता था। मुरादनगर की सड़कों और नालों की बदहाल व्यवस्था अब सीधे प्रशासनिक विफलता की कहानी कह रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—मुरादनगर में खुले नालों के कारण हो रही मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या नगर पालिका परिषद इन मौतों से अपना पल्ला झाड़ सकती है? या फिर अब समय आ गया है कि लापरवाही पर जवाबदेही तय हो, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो और शहर के इन “मौत के नालों” को तुरंत सुरक्षित कराया जाए। क्योंकि अगर अब भी आंखें बंद रहीं, तो अगला शव किसका होगा यह कोई नहीं जानता।

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