कलम का सौदागर: जब पत्रकारिता दलाली में बदल जाए शेर जो सच लिखने निकले थे, वो बिकने लगे बाजार में,कलम झुकती गई उनकी, सत्ता के दरबार में।लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता कभी समाज की आवाज हुआ करती थी। पत्रकार का काम सत्ता से सवाल करना, पीड़ितों की आवाज उठाना और सच को जनता तक पहुंचाना था। लेकिन आज कुछ तथाकथित पत्रकारों ने इस पवित्र पेशे को दलाली का अड्डा बना दिया है। हाथ में कैमरा, गले में आईडी कार्ड और मुंह पर पत्रकारिता का मुखौटा लगाकर ये लोग थानों, तहसीलों और सरकारी दफ्तरों में दलाली की दुकान चला रहे हैं। ये वो लोग हैं जो जनता के दुख-दर्द को खबर नहीं, कमाई का जरिया समझते हैं। कोई पीड़ित न्याय की उम्मीद लेकर इनके पास आता है, लेकिन उसकी मजबूरी का सौदा कर लिया जाता है। कहीं पुलिस से सेटिंग कराने के नाम पर वसूली होती है तो कहीं खबर रोकने के नाम पर सौदेबाजी। कलम अब सच लिखने के लिए नहीं, बल्कि दबाव बनाने और अपना उल्लू सीधा करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। शायरी कलम थी कभी इंसाफ की पहचान दोस्तों,अब बिकने लगी है सरेआम दोस्तों। जो सच के लिए लड़ते थे कभी मैदानों में,वो आज कर रहे हैं दलाली थानों में। ऐसे लोगों ने असली पत्रकारों की मेहनत और सम्मान को भी दागदार कर दिया है। आज भी कई ईमानदार पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर सच दिखा रहे हैं, लेकिन कुछ दलाल प्रवृत्ति के लोग पूरे मीडिया जगत को बदनाम करने में लगे हैं। समाज को अब असली और नकली पत्रकारों के बीच फर्क समझना होगा। पत्रकारिता कोई धंधा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। कलम बिक जाए तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है और जब पत्रकार दलाल बन जाए, तो जनता का भरोसा टूट जाता है।
नैशनल टुडे 24 × 7 सैटेलाइट चैनल के फर्जी पत्रकार यूसुफ खान उर्फ वाई के राजपूत की कलम से कड़वा सच शेर शायरी के साथ
byसंवाददाता मोहम्मद अजहर
-
0
